24 साल पहले ऐसा “क्या” हुआ कि मद्रास नाम बदलकर चेन्नई कर दिया गया?

Why Madras Became Chennai

Madras Ka Naam Chennai

भारत का इतिहास हजारों साल पुराना है। यहां पर कई शासकों ने शासन किया, कई शहरों को बसाया और उन्हें अपने हिसाब से नाम दिए।

मुगलों के शासन में शहरों के नाम औरंगाबाद, शाहजहानाबाद, हैदराबाद, अहमदाबाद, अहमदनगर होने लगे थे।

बाद में, जब अंग्रेज आए, तो उन्होंने उनके तरीके से नाम देने शुरू कर दिए जो उन्हें लगता था कि यह आसान होगा। उन्होंने अपने तरीकों से बॉम्बे, कलकत्ता, बैंगलोर और दिल्ली जैसे सरल नामों का उपयोग किया गया।

स्वतंत्रता के बाद भारत में लोकतंत्र की स्थापना हुई और साथ ही कुछ शहरों का नाम बदलने का सिलसिला भी शुरु हो गया।

बॉम्बे को मुंबई, कलकत्ता को कोलकाता और बैंगलोर और बेंगलुरु कर दिया गया।

हालांकि इनमें नाम बदलने के पीछे कुछ कारण थे। जैसा कि मुंबई नाम का उपयोग स्थानिक मराठी लोग कर रहे थे, तो क्यों नहीं यही नाम दिया जाए? क्यों चाहिए ऐसे मुगलों और अंग्रेजों द्वारा दिए गए नाम? ऐसी ही एक हवा दूसरे शहरों में भी चली और कई शहरों का नामकरण होने लगे।

 

चेन्नई के नामकरण की कहानी भी…

आपको जानकर हैरानी होगी कि चेन्नई नाम तेलुगु मूल का है। जी हाँ आपने सही पढ़ा, यह एक तेलुगु शासक दमारला मुदिरसा चेन्नाप्पा नायककुडु, दमारला वेंकटपति नायक के पिता, एक नायक शासक के नाम से लिया गया था, जिन्होंने विजयनगर साम्राज्य के वेंकट III के तहत एक जनरल के रूप में कार्य किया था, जिनके बाद 1639 में अंग्रेजों ने इस शहर का अधिग्रहण किया था।

इतिहास आपका पसंदीदा विषय नहीं हो सकता है, लेकिन सिर्फ आपके ज्ञान के लिए कि एक विशिष्ट दिन भी है जब चेन्नई शब्द का पहली बार इस्तेमाल किया गया था। चेन्नई नाम का पहला आधिकारिक उपयोग 8 अगस्त 1639 को ईस्ट इंडिया कंपनी के फ्रांसिस डे को एक बिक्री विलेख में किया गया था।

मद्रास शहर का अपनी स्थापना से हमेशा स्थानीय नाम रहा है। इसे अंग्रेजों द्वारा मद्रास कहा जाता था लेकिन स्थानीय आबादी द्वारा इसे चेन्नापट्टिनम भी कहा जाता था। इसका कारण यह है कि ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा खरीदी गई जमीन जिसे मद्रास पोर्ट और फोर्ट सेंट जॉर्ज (ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रशासनिक सीट), सेंट मैरीज़ चर्च की स्थापना और इसके आसपास व्यवसाय और निवास बिजनेस के उद्देश के लिए। इस जमीन को तेलुगु बोलने वाले ज़मींदार चिन्नप्पा नाइकर से खरीदी गई थी।

इस सौदे की मूल बिक्री विलेख और राशि को मद्रास के सरकारी अभिलेखागार एग्मोर में देखा जा सकता है। उस समय से स्थानीय लोग इस शहर को चेन्नई पट्टिनम (तमिल में पट्टिनम का अर्थ है बंदरगाह का शहर) कहा जाने लगा, जबकि ब्रिटिश इसे मद्रास कहते थे। मद्रास आधिकारिक नाम था और बाद में यह पूरे दक्षिण के लिए राजधानी था जिसे मद्रास प्रेसीडेंसी के रूप में जाना जाता था।

 

लेकिन शब्द ‘मद्रास’ के अस्तित्व में आने के और भी कई सिद्धांत हैं। सबसे आम हैं-

यह कहा जाता है कि मद्रास नाम, पुर्तगाली शब्द ‘Madre de Deus’ से दिया गया हैं, जिसका अर्थ है ‘मदर ऑफ गॉड’। इस बंदरगाह शहर में पुर्तगाली प्रभाव के कारण, विशेष रूप से सेंट मैरी चर्च का जिक्र है।

दक्षिणी ‘मद्रासपट्टनम’ एक बड़ा क्षेत्र था। राज्य बहुत बड़ा था। कन्नड़, मलयालम, तेलुगु और तमिल भाषी सभी शामिल हैं।

लेकिन, कुछ का कहना है कि मद्रास नाम संस्कृत में ‘मधुरस’ शब्द से लिया गया है।

ब्रिटिश सैन्य मैप निर्माता के सदस्यों का मानना ​​था कि मद्रास मूल रूप से मुंडिर-राज या मुंडिराज था, जो एक तेलुगु समुदाय मुदिराज का नाम था, जो तत्कालीन मद्रास के मूल निवासी थे।

यह नाम संभवतः वहां बने कई मंदिरों के कारण भी है।

हालाँकि, विजयनगर-युग के एक शिलालेख में वर्ष 1367 का उल्लेख है जो मर्दनस्पतनम के बंदरगाह का उल्लेख करता है, साथ ही 2015 में पूर्वी तट पर अन्य छोटे बंदरगाहों की खोज की गई थी और यह सिद्धांत दिया गया था कि पूर्वोक्त बंदरगाह रॉयपुरम का मछली पकड़ने वाला बंदरगाह है।

मद्रास नाम मद्रासपट्टिनम नाम से प्राप्त हुआ, जो कि फोर्ट सेंट जॉर्ज के उत्तर में मछली पकड़ने का गाँव था, से लिया गया था। हालाँकि, यह अनिश्चित है कि यूरोपीय लोगों के आने से पहले नाम का उपयोग किया गया था या नहीं।

धीरे-धीरे यह विभाजित हो गया और आंध्र, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्य बन गए। मद्रास पोर्ट सिटी को तमिलनाडु की राजधानी के रूप में जाना जाता है …

 

‘मद्रास’ बन गया ‘चेन्नई’ ..

स्वतंत्रता के बाद में, ‘मद्रास प्रेसिडेंसी’ 15 अगस्त 1947 को ‘मद्रास प्रांत’ बना। 26 जनवरी 1950 को इसे भारत सरकार द्वारा ‘मद्रास राज्य’ के रूप में बनाया गया था। 1956 के राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम के परिणामस्वरूप, राज्य की सीमाएँ भाषाई लाइनों के बाद फिर से संगठित हुईं। 14 जनवरी 1969 को राज्य का नाम बदलकर अंतत: तमिलनाडु रखा गया।

मद्रास नाम का उपयोग हर जगह किया जा रहा था, लेकिन इक्कीस साल पहले तमिलनाडु में सत्ता में रही करुणानिधि सरकार को भी अन्य राज्यों की सरकारों की तरह नाम बदने की लहर आ गई और उन्होंने तुरंत मद्रास का नामकरण कर दिया। जहाँ भी शहर के नाम बदले गए, वहाँ एक छिपा हुआ राजनीतिक एजेंडा था।

मातृभाषा किसी को भी प्यारी होती है। विदेशियों ने हमारे शहरों को दिए हुए नामों को अपने ही मिटटी के, अपनी मातृभाषा के नाम दिए, तो लोग हमारे लिए अधिक आदर महसूस करेंगे।

यही आदर बाद में मतपेटी में भरकर हमारे वापस लौट आएगा। यानी अपनी ही पार्टी के वोट बैंक में सुधार होगा। यही था मुख्य उद्देश्य इस नामकरण का। यही राजनीतिक एजेंडा था। तो मद्रास भी नई दुल्हन की तरह, चेन्नई नाम के साथ तैयार हुआ।

1996 में, तमिलनाडु सरकार ने आधिकारिक तौर पर ‘मद्रास’ से ‘चेन्नई’ नाम बदल दिया। उस समय कई भारतीय शहरों ने नाम में बदलाव किया, मुख्यतः क्योंकि भारतीय शहरों और क्षेत्रों में अधिकांश लोग अंग्रेजों से नाराज थे, क्योंकि वे नामों का सही उच्चारण नहीं कर पाए थे! उदाहरण के लिए, मुंबई के रूप में मुंबई, कोलकाता के रूप में कोलकाता, आदि।

हालाँकि चेन्नई नाम का उपयोग पिछले तीन सौ सालों से स्थानीय लोगों द्वारा अपने शहर को संदर्भित करने के लिए किया जाता रहा है। अब यह आधिकारिक हो गया है। हम में से कई अभी भी इसे मद्रास कहते हैं। हालांकि सरकार ने कोशिश की कि वे कानूनी रूप से मद्रास विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों को अपना नाम बदलने के लिए मजबूर न कर सकें क्योंकि वे सरकार के एक चार्टर के तहत स्थापित किए गए थे।

 

शेक्सपियर ने कहा था, की नाम में क्या है

शहरों के नाम बदलने से राजनीतिक लाभ से परे आम लोगों को बहुत कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन मातृभाषा का मुद्दा लोगों की भावनाओं से बना है और फिर ऐसे नामों को पेश किया जाता है।

बेशक, चेन्नई के कुछ संस्थानों के नाम ‘मद्रास’ से शुरू करना संभव नहीं था।

भले ही मद्रास हर जगह चेन्नई हो गया था, लेकिन मद्रास मेडिकल कॉलेज, मद्रास विश्वविद्यालय, आईआईटी मद्रास, मद्रास वेटरनरी कॉलेज आदि को यथावत रखा जाना था। इस वजह से, मद्रास नाम को पूरी तरह से मिटाया नहीं जा सकता।

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