संत गाडगेबाबा: महान समाज सेवक का जीवन, घटनाएं, विचार

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Sant Gadge Baba

Sant Gadge Baba-

गाडगे महाराज

नाम:  देबूजी झिंगराजी जोंकरकर

जन्म: 23 फरवरी 1876, महाराष्ट्र, ब्रिटिश भारत

निधन: 20 दिसंबर 1956 (आयु 80), अमरावती, भारत

मुख्य रुचियां: धर्म, कीर्तन, आचार

 

Sant Gadge Baba

संत की श्रृंखला में पहले संत ज्ञानेश्वर है। ज्ञानेश्वर ने संत श्रृंखला की नींव रखी नामदेव ने पूरे भारत में इसका विस्तार किया। नाथ ने इस पर इमारत बनवाई और तुकाराम महाराज ने इसका शिखर चढ़ाया। बाकी का काम गाडगेबाबा ने पूरा किया। यही कारण है कि संत गाडगे बाबा को संतों की श्रृंखला में ‘शिरोमणि’ के रूप में जाना जाता है।

जिस तरह से पिछले संतों ने रास्ता दिखाया, गाडगेबाबा उसपर चले, समाज में धर्म के नाम पर होने वाले अन्याय, अत्याचार और अधर्म को खत्म करने के लिए, उन्होंने जीवन के अंतिम क्षण तक संघर्ष किया। उन्होंने 50-60 वर्षों तक निस्वार्थ भाव से महाराष्ट्र की सेवा की।

अज्ञानता, अंधविश्वास, विघातक रीति-रिवाजों का विरोध, कीर्तन के माध्यम से लोगों को जागरूक करना ही उनका कार्य था। उनकी सीख थी कि चोरी न करें, कर्ज न लें, व्यसन के अधीन न रहें। वे कहते थे देव-धर्म के नाम पर जानवरों को ने मारे, अस्पृश्यता का पालन ने करें।

गाडगेबाबा, गोधडीवाले बाबा, चिंधे बाबा, लोटके महाराज के नाम से प्रसिद्ध थे। वे कीर्तन के माध्यम से जन जागरूकता का काम बखूबी करते थे।

महाराष्ट्र समाज के मंच पर स्वच्छता, ईमानदारी, और भूतदया। ईश्वर पत्थर में नहीं, मनुष्य में है। गद्दी या मठ स्थापित न करें। धार्मिक क्षेत्रों में उन्होंने, धर्मशाला, गरीबों के लिए अस्पताल, नदी पर घाट निर्माण, विकलांगों के लिए खाद्यान्न का निर्माण, कुष्ठ सेवा जैसे कई महान कार्य किए।

 

Sant Gadge Maharaj

कुछ लोग खुद के लिए पैदा नहीं होते। दुनिया के लिए अपने आप को खपाना ही उनका जीवनधर्म होता हैं। उनके हाथों में सोने-चाँदी के कंगन नहीं होते, लेकिन निस्वार्थ सेवा का संकल्प होता हैं। वंचित-गरीबों के लिए दिल से प्यार की नदी बहाने वाले ऐसे महान लोगों का चेहरा एक ही होता हैं।

सताएं गए लोगों की चीखें सुनने के लिए दौड़ जाना और गिरते हुए को उठाना, यहीं उनका जुनून था। अपने काम से दुनिया को खुबसुरत बनाने वाला ऐसा एक डेबू नाम का अवलिया ही हैं – संब गाडबेबाबा!

 

Sant Gadge Baba Biography In Hindi

Sant Gadge Baba- Different Saints

* अलग संत

गाडगे महाराज, भगवान किस चीज में हैं इस बात से अवगत थे और गरीब और दीन लोगों के भौतिक, सांसारिक और आध्यात्मिक विकास के लिए वे अज्ञानता, अंधविश्वास और अस्वच्छता को मिटाने के लिए वे तन-मन से काम कर रहे थे।

“तीर्थी धोंडापाणी देव रोकडा सज्जनी” ऐसे कहते हुए दीन, लाचार, अनाथ, विकलांगों की सेवा करने वाले महान संत थे गाडगेबाबा।

वे कहते थे, “मंदिर न जाएं, मूर्तियों की पूजा न करें, सावकार से कर्जा न लें, अशिक्षित न रहे, पोथी-पुराण, मंत्र-तंत्र, देव-देवकी, चमत्कार जैसी बातों पर विश्वास न करें।” उन्होंने जीवन भर लोगों को यही सिखाया।

उन्होंने महाराष्ट्र में जगह-जगह पर अनाथ लोगों के लिए, धर्मशाला, अनाथालय, आश्रम और स्कूल शुरू किए।

दुःखित , पीडित, दीन-कमजोर, विकलांग और अनाथ लोग ही उनके भगवान थे। इन देवताओं में गाडगेबाबा का मन अधिक रमता था। उनके सीर पर मिट्टी के बर्तन का टूटा हुआ टुकड़ा, एक कान में कौड़ी तो दूसरे कान में फूटी हुई चूड़ी की कांच, एक हाथ में झाडू तो दूसरे हाथ में एक कटोरा (गाडगे) रहता था।

 

Sant Gadge Baba- Childhood

बचपन:

गाडगे महाराज का जन्म अमरावती जिले के शेणगाव में हुआ था। उनका पूरा नाम डेबूजी झिंगाराजी जनोकर था। उनका जन्म उनकी माता के मायके मुर्तिजापुर तालुका में, दपूरे में हुआ था। उनके मामा के पास एक बड़ा खेत था। वह बचपन से ही खेती में रुचि रखते थे, विशेष रूप से मवेशी रखरखाव के क्षेत्र में। उनके पिता झिंगाजी एक धोबी थे। उनकी माता सखुबाई ने उसका नाम डेबूजी रखा।

डेबूजी जब छोटे थे, तब उनके पिता की शराब की लत से मौत हो गई थी। यही कारण है कि चूंकि घर की स्थिति बहुत खराब थी, वे बचपन से ही आजीविका के लिए जुताई, खेती आदि करते थे। उन्हें काम बहुत पसंद था। स्वच्छता उनका एक विशेष गुण था। डेबूजी का विवाह उनके बचपन में ही हो गया था। उनकी चार बेटियाँ थीं। लेकिन उनका मन संसार से जल्द ही उब गया।

एक अज्ञान आत्मा की आवाज सुनकर, उन्होंने 1 फरवरी 1905 को सुबह 3 बजे दुनिया का संसार सुखी करने के लिए अपनी खुशी की दुनिया को छोड़ दिया।

डेबूजी ने दहलीज को पार किया, वह केवल गरीब लोगों के कल्याण के लिए। उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए – आत्म उद्धार के लिए। उन्होंने सब कुछ त्याग दिया। डेबूजी का बलिदान कर्तव्यों से भरा था। गरीबों की भलाई के लिए डेबूजी ने कांटेदार मार्ग का इस्तेमाल किया।

देश का भ्रमण करते हुए उन्होंने लोगों की दयनीय स्थिति देखी। सच्चे भगवान को समाज भूल चुका था। उनकी हालत दयनीय हो गई थी। अज्ञातवास में उनके चेहरे, आंखों पर बढ़े हुए केस, बदन पर फटे हुए कपड़े, एक कान में लगाई हुई चूड़ी का कांच और दूसरे में कौड़ी, एक हाथ में झाड़ू और दूसरे हाथ में मिट्टी का बर्तन (मराठी में इसे गाडगे कहा जाता हैं)।

यदि कोई उनको उनका नाम पूछते तो, तो वे कहते थे की “आप जिस नाम को चाहते हैं उस नाम से बुला सकते हैं। मैं नाम नहीं जानता।“ इसलिए उन्हें इतने नाम मिले। उनके हाथ में हमेशा वह मिट्टी का बर्तन रहता था, जिसे मराठी में गाडगे कहते हैं, इसलिए लोग इस बाबा को ‘गाडगेबाबा’ कहकर पुकारते थे।

वैसे तो गाडगेबाबा का यह बैरागी अवतार दिखने में बहुत ही अजीब लगता था। इसीलिए कुछ लोग उन्हें पागल समझते थे, उन्हें लगता था कि वे भिखारी हैं। उनके लिए मंदिर और श्मशान एक ही थे। उनको भजन करने के लिए मंदिर, मस्जिद, चर्च की आवश्यकता नहीं थी। शांत स्थान, नदी-नालों के किनारे ही उनके भजन और कीर्तन का कार्यक्रम चलता था। एक गाँव में बाबा ज्यादा समय नहीं रुकते थे। उन्हें पता नहीं होता था कि आगे कहां जाना है।

इस अवधि के दौरान, बाबा ने महाराष्ट्र को ‘झाडू का मंत्र‘ दिया। बाबा जहां भी होते थे ग्रामीणों का दिल जीत लेते हैं। वहां से, सामुदायिक कुओं, धर्मशाला का निर्माण शुरू किया।

विषमता और जाती-भेद पर आघात करने का बाबा का तरीका बहुत प्रभावी था, लेकिन कभी-कभी कॉमेडी होती थी। ‘हर किसी के जन्म का एक तरीका होता है और मरने का भी, तो फिर ये छुत-आछुत किस लिए? आपको इस कलंक को मिटाना होगा।‘ वे कहते थे।

समाज को प्रबोधन करने के लिए बाबा का कीर्तन एक प्रभावी साधन बन गया। वह अंधविश्वासों, पारंपरिक रीति-रिवाजों और धर्म के नाम पर शोषण के प्रबल विरोधी थे। मूर्ति पूजा से अधिक वे गरीबों की सेवा पर केंद्रित थे। सामाजिक-आर्थिक सुधार के लिए, अंधविश्वास को खत्म करने के लिए, दारू बंदी के लिए, अस्पृश्यता को नष्ट करने के लिए, भेदभाव की अवधारणा को खत्म करने के लिए, हर जगह शिक्षा का प्रसार करने के लिए, उन्होंने अपना सारा जीवन इस नेक कामों में लगा दिया।

राष्ट्रीय और सामाजिक कार्यों के लिए उन्होंने जो काम किया, उसका कोई जवाब नहीं। बाबा ने अपने कीर्तन के माध्यम से शोषण, काला बाजारी और किसान समुदाय की लूट पर बड़ी मात्रा में प्रकाश डाला। यही कारण है कि बाबा समाजवादी संत की तरह दिखते हैं। दीनदुबलों की सेवा उनके जीवन का संकल्प था। वे जानते हैं कि भूखे के लिए भोजन, प्यासे के लिए पानी, नग्न लोगों के लिए कपड़े, बेघर लोगों को दवाएं, गरीब लड़कों और लड़कियों का इलाज, जानवरों को आसरा- इसी में हैं एक सच्चा धर्म है। यह वह है जिसे उन्होंने ईश्वर की सेवा माना है।

 

Sant Gadge Baba – Social Reform

सामाजिक सुधार:

उनकी शादी 1892 में हुई। अपनी बेटी के जन्मदिन के दिन, उन्होंने एक प्रथा के रूप में शराब और मांस के बजाय मीठा भोजन दिया था। यह उस समय की परंपरा को दिया गया छेद था। गाँव में किसी का कुछ काम रुक गया हो, या जब भी कोई काम करना होता था, तो गाडगे महाराज स्वयं आगे आते थे। जनहित के कार्य सभी लोगों को करने चाहिए और यह सबक उन्होंने बिना बोले ग्रामीणों को सिखाया।

1 फरवरी 1905 को, उन्होंने अपने घर को त्याग दिया और संन्यास ले लिया। उन्होंने तीर्थयात्राएँ कीं, विभिन्न स्थानों का दौरा किया। उन्होंने अपने वनवास में भी जनसेवा का संकल्प नहीं छोड़ा। अगर किसी को कोई परेशानी होती है, तो वे तुरंत उसकी मदद करने के लिए दौड़ पड़ते थे, मदद करने के लिए किसी फल की उम्मीद किए बिना वे अपने रास्ते निकल जाते थे।

वे जिस गाँव में जाते थे, उस गांव को झाडू लगाकर सफाई करते थे। उन्होंने समाज में सक्रिय रहने, सार्वजनिक स्वच्छता, अंधविश्वास विरोधी काम करने की पूरी कोशिश की।

गरीब परिवार में जन्मा यह रत्न किसी स्कूल या कॉलेज में नहीं गया है। फिर भी, उन्होंने शिक्षाविदों को भी शर्मिंदगी होगी ऐसा तत्त्वज्ञान बताया।

महाराष्ट्र में महान संत परंपरा है। ज्ञानोबा से विनोब तक। लेकिन, गाडगे महाराज इन सबसे अलग प्रकृति के संत हैं। संत कहने पर हमारी आंखों के सामने खड़ी होती है, भगवे कपड़े, माला, बुक्का, अष्टगंध, आदि की ऐसी तस्वीर। लेकिन गाडगेबाबा उस गाँव के यात्री नहीं थे। उनका तरीका अलग है। यह संत तो है, लेकिन कैसे? पंढरपूर के मंदिर में कभी पैर नहीं रखा। किसी मूर्ति के सामने माथा नहीं टेका। उलटा लोगों को हमेशा तीर्थ यात्रा पर न जाने का ही उपदेश दिया। यज्ञ अनुष्ठान, कर्म कांड को नकार दिया। ऐसा करने वालों का विरोध कठोर शब्दों में किया, लेकिन फिर भी हमारे वंदनीय संतों कि मालिका में, उनका स्थान ध्रुव तारे के समान हैं।

मूर्तियां, मंदिर, यज्ञ यह सभी प्रतीक हैं, वे जानते थे कि ये केवल लाचार लोगों का आधार हैं। सामर्थ्यवान को उनकी जरूरत नहीं है। लेकिन, अज्ञानी और भोले लोग इन प्रतीकों को भगवान, धर्म समझते हैं। उनके भोलेपन का फायदा लेकर चालाक लोग अपनी दुकानें चलाते हैं और फिर धर्म का बाजार हो जाता हैं। सरल राख भी अंगारा बन जाती हैं। मिट्टी को सोने की कीमतों में बेचा जाता है। अज्ञानी व्यक्ति की जेब काटकर उसका शोषण किया जाता हैं। Sant Gadge Maharaj के अलावा और कोई नहीं है जो निर्भय और निर्भीक रहकर इसे रोकने कि कोशिश कि हो।

 

Sant Gadge Baba – Great Social Reformer

* महान समाज सुधारक

गाडगेबाबा के काम के कारण उनके अंदर का संत केवल धार्मिक समूहों तक सीमित नहीं रहा। यह मानव जीवन की सभी दिशा को छूता है और उसे उज्ज्वल कर देता है। इसलिए किसी को वे संत लगते हैं, तो दूसरों के लिए वे महान समाज सुधारक माने जाते है।

अन्य संतों ने भी सामाजिक सुधार किए हैं। लेकिन, शब्द और भाषण के अलावा उन्होंने शायद ही कभी अन्य साधनों का इस्तेमाल किया हो। डेबूजी के हाथों में ‘फूटा हुआ बर्तन (गाडगं)’ और ‘झाडू (खराटा)’ ऐसे अनूठे साधन थे। उन प्रतीकों के पीछे एक बड़ी मंशा थी। आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन की समानता की आवाज आसमान से गुंजती हुई सुनाई देती हैं और एक कृतिशील कर्मयोगी जीवन की जुगलबंदी होती हैं। इसके द्वारा निर्माण होने वाला संगीत बहुत प्रभावी और प्रेरणादायक है। कुंभकरन नींद में सो रहे समुदाय को यह जगाता हैं।

उस समय का मराठी समाज, खासकर विदर्भ का समाज भी परंपरा और अंधविश्वास की चपेट में आ गया था; इसके अलावा, अज्ञानता के कारण इसकी गति रुक गई थी। कई तरह की आदतें और व्यसन से उन्मत्त काले अंधेरे रास्तों पर फैला हुआ यह समाज, राख लगाकर, जटा बढ़ाकर, माला पहने हुए कोई बैरागी आता तो उसे भगवान मानकर स्वागत करते थे। भिक्षु और भोंदू के बीच की सीमा को पूरी तरह से नष्ट किया गया था। यदि उनके बच्चे मलेरिया से पीड़ित होते थे, तो वे डॉक्‍टर के पास न जाकर, मरीमाय का कोप समझकर मुर्गा-बकरा कांपते थे, दुनिया में एकमात्र आधार वाली अपनी खेती बेचकर कर्ज निकालते थे और शानदार शादी समारंभ करते थे, चारधाम और काशी यात्रा कर खुद को कृतकृत्य समझते थे। इस वजह से बड़े वैभव वाले बहुत जल्द ही बर्बाद होकर आई हुई गरीबी और दुष्चक्र में लोगों का जीवन पूरी से पीस जाता था।

लेकिन, जिस ज़मीन में हमारी जड़ें बहुत गहरी हैं, वह भारत की भूमि देवभूमी है। अॅनी बेझंट जैसी एक रूढ़िवादी यहां की मिट्टी को अपने माथे पर लगती हैं, तो इसमें गहरा अर्थ होता हैं। यह कबीर तुलसी की जन्मभूमी, ज्ञानेश्वर-तुकाराम की कर्मभूमी हैं। जब समाज ऐसे एक जाल में पड़ने लगता हैं, तो संत महंत उसे संवारने आ जाते हैं। अंधकार से मुक्त प्रकाश की और ले जाने के लिए तेजोवलय को वे अपने सिर पर ले आते हैं। ज्ञानोबा के बाद इसका दर्शन महाराष्ट्र को गाडगे महाराज की आँखों में दिखाई दिया होगा। यहां हीन हो चुके जीवन में नवचैतन्य लाने के लिए आत्मतेज ज्‍वलंत करने का उनका सामर्थ्य इसी में हैं। उन्होंने ही यहां के लोगों को अंधकार से बाहर आने का मार्ग दिखाया।

 

Sant Gadge Baba- Opposing Superstition

* अंधविश्वास का विरोध

गाँव का जीवन, अज्ञानता, अंधविश्वास, देवधर्म, भोलेपन में पूरी तरह से खो गया था। जाति के जंगल में मानवता का रास्ता भुला दिया गया था। जानवरों को संभालने के समय से ही डेबुजी को यह सवाल चुभता था। सभी साथीयों के खाने को एक साथ मिलाया जाता था और फिर सभी खाना खाते थे। एक बार उनके एक साथी ने धर्म भ्रष्ट होने के डर के बारे में कहा, तब डेबूजी ने उनसे कहा कि, “अरे हमें दो आँखें, उनको भी दो आँखें, हमें एक मुंह, एक नाम वैसे ही उनको भी हैं। जैसे हम मनुष्य हैं, वैसे ही वे भी मनुष्य हैं..”

आगे उन्होंने हाथ में झाडू (खराटा) लेकर गांव-गांव और लोगों के मन का यह कचरा साफ करने का अखंड व्रत ही शुरू किया। गांव कि गंदी बस्तियों को वे साफ करते थे। साफसफाई होने के बाद वे पाटील-देशमुख, ब्राह्मण-महार इनके बारे में न सोचते हुए किसी के भी दरवाजे के सामने खड़े होकर भीख मांगते थे। मुक्त में उन्होंने कभी खाया नहीं। अपने साथी और शिष्यों को भी मुक्त में खाने नहीं दिया। श्रम, प्रतिष्ठा और मानवतावाद ये बाते उनके झाडू यज्ञ ने हासिल किए।

उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज में अज्ञानता, अंधविश्वास, भोली मान्यताओं, अविवेकपूर्ण परंपरा को खत्म करने के लिए समर्पित कर दिया। इसके लिए उन्होंने कीर्तन का रास्ता अपनाया। अपने कीर्तन में, वे श्रोताओं से विभिन्न प्रश्न पूछते थे और उन्हें उनकी अज्ञानता, कुप्रवृत्तियों और दोषों से अवगत कराते थे। उनके उपदेश सरल, सहज थे। चोरी न करें, सावकार से ऋण न लें, व्यसनों में न जाएं, ईश्वर-धर्म के नाम पर जानवरों को न मारें, जाति और अस्पृश्यता का पालन न करें, ऐसे उपदेश वे अपने कीर्तन के माध्यम से लोगों को देते थे।

उन्होंने पत्थर में नहीं बल्कि लोगों में भगवान को देखने के लिए प्रेरित किया। वे संत तुकाराम महाराज को अपना गुरु मानते थे। वे हमेशा कहते थे, ‘मैं गुरु नहीं हूं, मैं शिष्य नहीं हूं।’ वे आम लोगों के सरल विचारों को समझने के लिए ग्रामीण भाषा (मुख्य रूप से वऱ्हाडी बोली) का उपयोग करते थे। गाडगेबाबा ने समय-समय पर एक बड़ी मदद के रूप में संत तुकाराम के अभंगों का भी उपयोग किया। ‘ईश्वरवादी लोगों से लेकर शहरी नास्तिकों तक, किसी भी आयु वर्ग के लोगों को गाडगेबाबा अपने किर्तन में आसानी से आकर्षित करते थे और अपना तत्त्वज्ञान समझाते थे।

“उनके कीर्तन को शब्दों में वर्णन करना मेरे ताकत के बाहर हैं” ऐसा उनके चरित्र लेखक प्रबोधनकार ठाकरे ने कहा।

 

Sant Gadge Baba – Public Welfare Works

* जनकल्याण के काम

चंदे के रूप में लाखों रुपये इकट्ठा करते हुए, उन्होंने लोकोपयोगी धर्मशाला, गौशाला और पाठशाला, घाट, तालाब का निर्माण किया। उनकी यह उपलब्धियों को देखने पर पता चलता हैं कि गाडगेबाबा केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि यह एक सचेत सोच थी जो विशाल जनसमूह के साथ एकजुट थी।

वे जीए, काम किया, उनकी मृत्यु हुई वह भी लोगों के बीच जनसमुदाय में। उन्होंने लोगों के लिए बड़ी-बड़ी संस्थाओं को शुरू किया, लेकिन अपने जीवनकाल में उन संस्थाओं को ‘संस्थान’ नहीं बनने दिया। उन्होंने कभी अपना सेवा भाव नहीं खोया।

 

* पत्नी को भी शिक्षा

एक बार उनकी बीमार पत्नी ने गउशाला से गाय का दूध लिया, इसलिए उन्होंने उसे उसी अवस्था में पूरी गउशाला साफ करने की शिक्षा दी। यह बहुत अच्छा उदाहरण है कि सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति कितना साफ होना चाहिए। यह उनका बहुत बड़ा आदर्श है। एक-एक पैसे का हिसाब वे अपनी डायरी में लिखते थे। वह डायरी उनके गलें में टंगी रहती थी। इसका बड़ा अर्थ है। कोई भी व्यक्ति आ सकता है, खाता देख सकता है, हिसाब देख सकता है, सब कुछ खुल्ला और स्वच्छ।

 

Sant Gadge Baba – Scientific Sight

* वैज्ञानिक दृष्टि

वे अंधविश्वासों और कर्मकांड के पोषण करने वाली पाथी, प्रथाओं का लगातार उपहास करते रहे। धर्म और विज्ञान का पालन करने वाले संत ही सच्चे समाज सुधारक होते हैं। आज भी अध्यात्म में इस बुवाबाजी चलती है। गाडगेबाना ने अध्यात्म को विज्ञान के परीस पर परखने का उपदेश किया। जैसे लगता हैं कि वे ही हमारे जीवन को सोने जैसा मूल्यवान बना सकते हैं।

धर्म, समाज और अर्थशास्त्र की त्रिवेणी गाडगे महाराज के जीवन और विचारों में हुई हैं। उनमें ज्ञानेश्वर, ज्योतिबा फूले और कार्लमैक्स भी हैं। एक के बिना दूसरा लंगड़ा है और इसलिए गाडगे महाराज एक पूर्ण स्वयंसिद्ध हैं।

इस वैराग्यमूर्ति गाडगेब ने विदर्भ की मिट्टी में 20 दिसंबर, 1956 को अंतिम सांस ली। इस साल बाबा 59 साल के हो चुके थे। बाबा ने दुनिया को सच्चाई का धर्म दिया, शिक्षा के महत्व को सिखाया, व्यसन मुक्ति का आंदोलन खड़ा किया, अनैतिकता के खिलाफ विद्रोह किया, कीर्तन के माध्यम से समाज को बदला, और रैयत शिक्षण संस्थान को वित्त प्रदान किया। लेकिन फिर भी, इस संत की उपेक्षा की गई। गाडगेबाबा को न्याय नहीं मिला, बाबा उपेक्षित रहे।

 

Sant Gadge Baba – Message

“संत गाडगेबाबा का दशसूत्री संदेश”

गाडगेबाबा प्रबोधन कविता

भूख के = भोजन

प्यासे को = पानी

नंगे को = वस्त्र

गरीब बच्चों के लिए = शिक्षा के लिए मदद

बेघर को = आश्रय

अंधे, लंगडे रोगियों के लिए = दवा

बेरोजगार को = रोजगार

पशु, पक्षी और जानवरों को  = अभय

गरीब युवा लड़के-लड़कियों की = शादी

उदास और निराश लोगों को = हिम्मत

गरीब लोगों को = शिक्षण

यही आज का धर्म है! यही सच्ची पूजा और ईश्वर भक्ति है!

 

Sant Gadge Baba’s character in Short:

संक्षिप्त चरित्र: –

गाडगे महाराज ने ऋणमोचन (विदर्भ) गाँव से कीर्तन के माध्यम से अपना शिक्षा कार्य शुरू किया।

उन्होंने ऋणमोचन में ‘लक्ष्मीनारायण’ का मंदिर बनवाया।

1808 में, पूर्णा नदी पर घाट बनाया गया था।

1925 में, उन्होंने मुर्तिजापूर में गो संरक्षण का काम किया और धर्मशाला और विद्यालय का निर्माण किया।

1917- पंढरपूर में चोखामेळा धर्मशाला बनवाई।

“मैं कोई गुरु नहीं हूं और मेरे कोई शिष्य नहीं हैं,” ऐसा कहते हुए उन्होंने किसी भी समुदाय का समर्थन करने से इनकार कर दिया।

8 फरवरी, ई. स. 1952 में ‘श्री गाडगेबाबा मिशन’ की स्थापना हुई और महाराष्ट्र में शिक्षा प्रणाली और धर्मशाला की स्थापना की गई।

गाडगे महाराज को गोधडे महाराज के नाम से जाना जाता था।

1932 – ऋणमोचन में सदावर्त संत को गाडगेबाबा ने शुरू किया।

गाडगे महाराज ने कीर्तन के माध्यम से जन जागरूकता का रास्ता अपनाया।

“गोपाला गोपाला देवकीनंदन गोपाला” गाडगे महाराज का पसंदीदा भजन था। यह फिल्म देवकीनंदन गोप के साथ उनके जीवन पर भी बन रही है। मन्ना डे ने इस गीत में “गोपाला गोपाला देवकीनंदन गोपाला” गाया।

आचार्य आत्रे गाडगेबाबा के बारे में कहते हैं, ‘सिंह को देखो जंगल में, हाथी को देखो वनों में, और कीर्तन में देखो गाडगेबाबा को’

1931 में वरवंडे में गाडगेबाबा के मार्गदर्शन में पशु हत्या को बंद कर दिया गया।

1954 – गाडगेबाबा ने मुंबई में जे.जे. अस्पताल के रोगियों के रिश्तेदारों को रहने के लिए अस्पताल के पास धर्मशाला बनाई है।

गाडगेबाबा ने डॉ. पंजाबराव देशमुख, और कर्मवीर भाऊराव पाटिल को उनके काम में मदद कि।

डॉ. अंबेडकर उन्हें गुरु के रूप में मानते थे।

20 दिसंबर, 1956 को पेढी नदी के तट पर, वलगाँव (अमरावती) में उनकी मौत हुई। अमरावती के गाडगे नगर में एक स्मारक है।

गाडगेबाबा और तुकडोजी महाराज

गाडगेबाबा और तुकडोजी महाराज के बीच का संबंध बहुत अंतरंग था।

 

Sant Gadge Baba Amravati University

Sant Gadge Baba Amravati University, जिसका नाम संत गाडगे बाबा पर रखा गया है, एक पब्लिक स्‍टेट यूनिवर्सिटी है जो भारत के महाराष्ट्र राज्य के विदर्भ क्षेत्र अमरावती में स्थित है।

 

Sant Gadge Baba and Dr. Babasaheb Ambedkar

Sant Gadge Baba

14 जुलाई 1941 को गाडगेबाबा की हालत ठीक नहीं थी। महानंदसामी नाम के उनके प्रशंसक मुंबई में आए डॉ. आंबेडकर को इस बात कि खबर दी। बाबासाहेब उस समय भारत के कानून मंत्री थे। और उन्हें शाम की ट्रेन से दिल्ली के लिए रवाना होना था। जैसे ही बाबासाहब को यह संदेश मिला, उन्होंने सभी कामों को बाजू में रखा। उन्होंने दो कंबल खरीदे और वे महानंदसामी के साथ एक अस्पताल गए। किसी से कुछ भी न लेने वाले गाडगेबाबा ने बाबासाहब के इन दो कंबल को स्वीकार किया। लेकिन उन्होंने कहा, “आपके यहां पर क्यों आए? मैं एक फकीर हूं, आप एक-एक मिनट महत्वपूर्ण है, आपका अधिकार बहुत बड़ा है।”

तब बाबासाहेब ने कहा, “बाबा, मेरा अधिकार दो दिन का हैं। कल कुर्सी चले जाने के बाद मुझे कोई नहीं पूछूंगा, लेकिन आपका अधिकार तो महान है।” इस मौके पर बाबासाहेब की आंखों में आंसू थे। क्योंकि उन दोनों को पता था कि इस तरह की घटना उनके जीवन में फिर से नहीं होगी।

 

Thoughts of Sant Gadge Baba

गाडगेब के विचार:

एक बार गाडगेबाबा सड़क पर जाते समय … उन्होंने एक व्यक्ति को एक पत्थर की पूजा करते हुए देखा। उन्होंने उस पत्थर पर एक हार डाल दिया है। दूध से नहलाया। इस बीच, एक कुत्ता आया और अपना एक पैर उठाकर इस पत्थर पर मूत्र विसर्जन करने लगा। उस व्यक्ति को गुस्सा आ गया वह कुत्ते से बहुत नाराज था। वह हाथ में एक पत्थर उठाकर कुत्ते को मारने लगा। गाडगेबाबा ने कहा, “उस बेचारे गरीब जानवर को तकलीफ क्यों देते हों? उसे कहां पता है कि लोगों का भगवान एक पत्थर है?”

एक बार पंढरपुर में, तिलक का भाषण था। बाबा सामने से आ रहे थे। सभी उनकी और देखने लगे। दर्शकों के मन को पहचानते हुए, तिलक ने बाबा को मंच पर लाया और दो शब्द बोलने के लिए कहा। बाबा तिलक के भाषण के बारे में जानते थे। जब बाबा मंच पर पहुंचे, तो बाबा ने तिलक के ब्राह्मण संप्रदाय को शब्दों को मारना शुरू कर दिया। बाबा ने कहा, “तिलक महाराज, हमने गलती कि हैं। हमने आजीवन आपके कपड़े धोये, प्रेस कि हैं। तब हम आपका मार्गदर्शन कैसे कर सकते हैं? महाराज कुछ भी करें, लेकिन हमें भी ब्राह्मण बनाए।”

 

** एक दिन बाबा का कीर्तन चल रहा था जब डाकिया ने एक तार लाई उस समय बाबा कीर्तन में तल्लीन थे। वह उनके पुत्र की मृत्यु की तार थी। डाकिया जोर से चिल्लाया- “बाबा, आपका गोविंदा नहीं रहा!”  बाबा ने यह शब्द सुना है, बाबा कुछ पल के लिए शांत हो गए हैं! फिर, अगले ही पल में, उन्होंने निर्विकार भाव के साथ कहा, “मर गए ऐसे लाखों के लाखों क्यों रोऊं एक के लिए”

अपने इकलौते  बेटे की मृत्यु का शोक पचाकर वे फिर से कीर्तन में दंग हो गए। उनके जीवन के ऐसे कई क्षणों ने उनको परखा हैं। वे खुद के लिए नहीं जी रहे थे।

सभी के लिए स्थितप्रज्ञ अवस्था का मार्ग दिखाने के लिए यह दीप जलता था।

 

क्रांतिकारी सन्यासी- स्वामी विवेकानंद: जीवन इतिहास, शिक्षा और रोचक कहानियाँ

 

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