वंदे मातरम्: इस तरह से उदय हुआ आजादी के महामंत्र का

Vande Mataram History Hindi

Vande Mataram in Hindi:

‘वंदे मातरम्’, हमारे देश के लिए एक महाकाव्य से कम नहीं है और हर भारतीयों के दिलों में इसका एक विशेष स्थान है। ‘वंदे मातरम्’ यह पहले दो शब्द देशभक्तिी की एक बड़ी भावना को प्रेरित करने के लिए पर्याप्त हैं।

भारत का राष्ट्रीय गीत,वंदे मातरम् को स्वतंत्रता के संघर्ष में लोगों को प्रोत्साहित करने की नींव माना जाता है।

वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है।

Bankim-Chandra-Chatterjee

ब्रिटिश शासकों ने सन् १८७०-८० के दशक में सभी सरकारी समारोहों में ‘गॉड! सेव द क्वीन’ गीत को गाया जाने के लिए अनिवार्य कर दिया था। बंकिमचन्द्र चटर्जी उन दिनों एक सरकारी अधिकारी (डिप्टी कलेक्टर)थे। उन्‍हें अंग्रेजों के इस आदेश से बहुत ठेस पहुँची। इसलिए ब्रिटिश शासकों के इस गीत के लिए अन्‍य विकल्प के लिए सम्भवत: १८७६ में नये गीत की रचना की जिसका शीर्षक था ‘वन्दे मातरम्’। यह गीत संस्कृत और बंगला के मिश्रण से बना था। पहले इस गीत के केवल दो ही पद लिखे गए थे और वे संस्कृत में थे, जिनमें मातृभूमि की वन्दना थी। इस उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है, जिसने  अंग्रेजी शासन और जमींदारों के शोषण और अन्य  प्राकृतिक प्रकोप जैसे अकाल में मर रही जनता को जागृत करने के लिए विद्रोह किया था। इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनायी थी।

१८८२ में जब उन्होंने आनन्दमठ नाम का एक बंगला उपन्यास लिखा तो इस गीत को उसमें शामिल कर लिया।

वन्दे मातरम् ब्रिटिश शासन में स्वतंत्रता के संघर्ष में लोगों को प्रेरणा का स्रोत था।

वन्दे मातरम् का उद्घोष सबसे अधिक 1905 में हुआ जब तत्कालीन गव्‍हर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने “बाँटो और राज करो” की नीति का अनुसरण करते हुए बंगाल को दो टुकडों  में विभाजित करने की घोषणा की और इस विभाजन को बंग-भंग का नाम दिया। लार्ड कर्जन की इस नीति का जबरदस्त विरोध हुआ। उस समय विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी आंदोलन के साथ-साथ वन्दे मातरम् को व्यापक रूप से जन-साधारण ने अपनाया। इसके बाद अंग्रेजों के विरुद्ध जो भी आंदोलन हुआ उसमें वंदे मातरम् जन-जन की वाणी बना। बंगाल से शुरु हुआ ये उद्घोष पूरे देश में फैल गया।

‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता सेनानियों का पसंदीदा शब्द बन गया। ‘वंदे मातरम्’ शब्दों के उत्थान ने स्वतंत्रता सेनानियों और आम जनता को अपने सिर पर लाठी को झेलने और अपने खुले शरीर पर चाबुक की मार का सामना करने की ताकत दी।

1896 में कलकत्ता में कांग्रेस की बैठक में इस गीत को पहली बार रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। बाद में पांच साल बाद इसे कलकत्ता में एक और कांग्रेस बैठक के दौरान दखिना चरण सेन ने गाया था।

7 सितंबर, 1905 को कांग्रेस के वाराणसी सत्र से पहले, वंदे मातरम् को ‘नेशनल सॉन्ग’ के रूप में अपनाया गया था और 1905 में बनारस कांग्रेस सत्र में राष्ट्रीय गीत गाया गया था।

कविता सरला देवी चौदुरानी ने 1905 में बनारस कांग्रेस सत्र में इस गीत को गाया।

लाला लाजपत राय ने लाहौर से वंदे मातरम् नामक एक पत्रिका शुरू की।

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा सन् २००३ में एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण आयोजित किया गया। इस सर्वेक्षण में दुनिया भर से लगभग ७,००० गीतों में से लोगों को उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों को चुनने के लिए कहां गया।

बी. बी. सी. के अनुसार १५५ देशों या द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था। गर्व करने वाली बात हैं कि वन्दे मातरम् टॉप के १० गीतों में दूसरे स्थान पर था।

वन्दे मातरम्!

सुजलां सुफलां मलयजशीतलां

शस्यश्यामलां मातरम्!

 

शुभ-ज्योत्सना-पुलकित-यामिनीम्

फुल्ल-कुसुमित-द्रमुदल शोभिनीम्

सुहासिनी सुमधुर भाषिणीम्

सुखदां वरदां मातरम्!

 

सन्तकोटिकंठ-कलकल-निनादकराले

द्विसप्तकोटि भुजैर्धृतखरकरबाले

अबला केनो माँ एतो बले।

बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं

रिपुदल वारिणीं मातरम्!

 

तुमि विद्या तुमि धर्म

तुमि हरि तुमि कर्म

त्वम् हि प्राणाः शरीरे।

बाहुते तुमि मा शक्ति

हृदये तुमि मा भक्ति

तोमारइ प्रतिमा गड़ि मंदिरें-मंदिरे।

 

त्वं हि दूर्गा दशप्रहरणधारिणी

कमला कमल-दल विहारिणी

वाणी विद्यादायिनी नवामि त्वां

नवामि कमलाम् अमलां अतुलाम्

सुजलां सुफलां मातरम्!

वन्दे मातरम्!

 

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम

धमरणीं भरणीम् मातरम्।

 

इसका अर्थ हैं –

हे माँ मैं तेरी वन्दना करता हूँ

तेरे अच्छे पानी,अच्छे फलों,

सुगन्धित,शुष्क,उत्तरी समीर (हवा)

हरे-भरे खेतों वाली मेरी माँ।

 

सुन्दर चाँदनी से प्रकाशित रात वाली,

खिले हुए फूलों और घने वृ़क्षों वाली,

सुमधुर भाषा वाली,

सुख देने वाली वरदायिनी मेरी माँ।

 

तीस करोड़ कण्ठों की जोशीली

आवाज़ें,

साठ करोड़ भुजाओं में तलवारों को

धारण किये हुए

क्या इतनी शक्ति के बाद भी,

हे माँ तू निर्बल है,

तू ही हमारी भुजाओं की शक्ति है,

मैं तेरी पद-वन्दना करता हूँ मेरी माँ।

 

तू ही मेरा ज्ञान,तू ही मेरा धर्म है,

तू ही मेरा अन्तर्मन,तू ही मेरा लक्ष्य,

तू ही मेरे शरीर का प्राण,

तू ही भुजाओं की शक्ति है,

मन के भीतर तेरा ही सत्य है,

तेरी ही मन मोहिनी मूर्ति

एक-एक मन्दिर में,

 

तू ही दुर्गा दश सशस्त्र भुजाओं वाली,

तू ही कमला है,कमल के फूलों की बहार,

तू ही ज्ञान गंगा है,परिपूर्ण करने वाली,

मैं तेरा दास हूँ,दासों का भी दास,

दासों के दास का भी दास,

अच्छे पानी अच्छे फलों वाली मेरी माँ,

मैं तेरी वन्दना करता हूँ।

 

लहलहाते खेतों वाली,पवित्र,मोहिनी,

सुशोभित,शक्तिशालिनी,अजर-अमर

मैं तेरी वन्दना करता हूँ।

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